
कौशल राज्य की स्थापना महाराज वैवस्वत मनु ने की थी इसकी राजधानी अयोध्या थी। इनके वंश को सूर्यवंश भी कहा जाता था इसी वंश मे आगे चलकर महाराज रघु , महाराज हरिश्चंद्र , महाराज इक्ष्वाकु , तथा महाराज दशरथ हुए। महाराज रघु तथा महाराज इक्ष्वाकु जी के नाम पर ही इस वंश का नाम रघुवंश तथा इक्ष्वाकु वंश पडा। महाराज दशरथ एक कुशल योद्धा , वेदों के ज्ञाता तथा धर्म-कर्म में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे लेकिन वे बिना संतान के परेशान रहते थे। उन्हें इस बात का बड़ा दुख था कि उनके कोई संतान नहीं है , एक बार वे गुरु वशिष्ट जी के पास गए और उन्होंने गुरुदेव के आगे अपनी समस्या बताई तब महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि आप पुत्रयेष्ठि यज्ञ कीजिए। इससे आप को संतान की प्राप्ति होगी तब गुरु वशिष्ठ ने कहा की इस समय महर्षि ॠंग वही एक महान व्यक्ति है जो इस यज्ञ को संपन्न करा सकते है। उस यज्ञ को करने के लिए महाराज दशरथ ने सर्वप्रथम अश्वमेध यज्ञ के लिए घोड़ा छोडा। महाराज दशरथ ने अपने मंत्रियों को आदेश दिया कि एक रथ तैयार कराएं और कुछ सैनिक और घोड़े तैयार कराएं क्योंकि ॠंग ऋषि के आश्रम जाना है। गुरु वशिष्ट जी ने कहा कि आप ऋंग ऋषि के पास कुछ मांगने जा रहे है , तो आपको नंगे पैर जाना चाहिए। महाराज दशरथ ने ऐसा ही किया। महर्षि ऋंग जी के पास जाकर उनसे प्रार्थना की कि उनके लिए पुत्रयेष्ठि यज्ञ करे तब ॠंग ऋषि उनकी भावनाओं को देखकर मान गए। महर्षि ॠंग अयोध्या यज्ञ करने गये तथा यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हुआ तब अग्निदेव यज्ञ मे से एक खीर का कटोरा लेकर प्रकट हुए और खीर का कटोरा महाराज दशरथ को दे दिया। ॠंग ऋषि ने कहा कि इस खीर को दो भागों में बांटकर अपनी रानियों को दे दीजिए। महाराज दशरथ ने आधी खीर महारानी कौशल्या को दे दी और आधी महारानी कैकेयी को दे दी। महारानी कौशल्या ने अपनी आधी खीर महारानी सुमित्रा को दे दी व महारानी कैकेयी ने भी अपनी आधी खीर सुमित्रा को दे दी।

खीर को खाने के कुछ समय पश्चात तीनों महारानियां गर्भवती हो गई। आगे चलकर चैत्र मास मे प्रभु श्री राम का जन्म हुआ। महारानी कैकेयी ने भरत तथा महारानी सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को शुभ-शुभ नक्षत्रो मे जन्म दिया। प्रभु श्री राम के जन्म उत्सव पर अयोध्या में हर्षोल्लास व त्यौहार जैसा माहौल था सभी ने वहां पर बहुत खुशियां मनाई। श्री रघुवर जी के जन्म के समय सभी देवताओ ने भी आकाश मे प्रकट होकर प्रभु श्रीराम पर पुष्प वर्षा की तथा उनके इस सुंदर रूप के दर्शन किए। राम जी भगवान विष्णु के अवतार थे उनकी कांति बचपन से ही मनोरम थी जो लोगों को आकर्षित करती थी।